शनिवार, 14 मई 2011

ऐसे में कैसे होगा खेल.........., कैसे बनेंगे उत्कृष्ठ खिलाड़ी......!


ऐसे में कैसे होगा खेल.........., कैसे बनेंगे उत्कृष्ठ खिलाड़ी......!

ताला लगा होता है गांधी स्टेडियम में

अम्बिकापुर/ यूं तो अम्बिकापुर और खासकर सरगुजा जिला खेल एवं यहां के प्रतिभावान खिलाड़ियों के लिये प्रदेश भर में अपनी एक अलग पहचान रखता है, खासकर एैथलेटिक्स के खिलाड़ियों की एक अच्छी खेप यहां पर मौजूद है। इन खिलाड़ियों को मात्र तराशने की जरूरत है बाकि उनमें ऐसा माद्दा है कि वे राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना सकते हैं। पिछले कुछ वर्षों में सरगुजा के काफी खिलाड़ियों ने विभिन्न खेलों में उत्कृष्ठ प्रदर्शन कर सरगुजा को गौरवांवित किया है। वहीं दूसरी ओर सरगुजा जिला के विभिन्न खेल संघों ने भी अपने खिलाड़ियों को अभाव के बीच किन्तु सफलता के अंतिम मुकाम तक पहुंचने का लक्ष्य लेकर काफी कुछ खिलाड़ियों को तराश कर सरगुजा के नाम को गौरवांवित किया है। लेकिन इतना कुछ होने के बावजूद प्रशासन ने और यहां के स्थानिय जनप्रतिनिधियों ने खेल एवं खिलाड़ियों के लिये क्या किया है, यह सवाल सबसे बड़ा और वाजिब है।
पिछले कुछ वर्षों में अम्बिकापुर नगर निगम, राज्य शासन व कई अन्य के सहयोग से गांधी स्टेडियम का कायाकल्प कर दिया गया है, गांधी स्टेडियम में कुछ सुविधाएं भी बढ़ा दी गई हैं। लेकिन इसके बावजूद इस खेल ग्राउण्ड का उपयोग सरगुजा के प्रतिभाशाली खिलाड़ी नहीं कर पाते। अम्बिकापुर नगर निगम व खिलाड़ी महापौर के होते हुए भी ग्राउण्ड में ताला जड़ा होता है। यदि कोई खिलाड़ी गेट को पार कर ग्रास मेट युक्त मैदान में दाखिल हो भी जाता है तो मानों उस पर आफत टूट पड़ी। मैदान की चौकिदारी में लगे लोग उसके साथ गाली-गलौच के अलावा क्या कुछ नहीं करते जो लोग स्टेडियम ग्राउण्ड में सुबह-शाम जाते हैं उन्हें अच्छी तरह से मालुम है, कि जाली लगे ग्रास मेट युक्त मैदान में जाने पर किस तरह का बर्ताव लोग करते हैं। इन सब के बीच एक ही प्रश्न बार-बार उठता है कि आखिरकार यह ग्राउण्ड है किसके लिये जिसे बनाने के बाद नगर निगम ने ताला जड़ दिया है।
जबकी यदि इस गांधी स्टेडियम की असलियत पर नज़र डाली जाये तो जो बात खुलकर सामने आती है, वह उन लोगों के लिये काफी चौकाने लायक होगी जो कि खेल से कुछ दूर है या फिर खेल के विषय में ज्यादा कुछ नहीं जानते। जब गांधी स्टेडियम का कायाकल्प कुछ वर्ष पूर्व हो रहा था और कुछ लोगों ने जब इसके निर्माण व गुणवत्ता पर अंगुली उठाई थी तो यह कहा गया था कि महापौर खुद एक खिलाड़ी रह चुके हैं और हैं भी वे कभी ग्राउण्ड का घटिया निर्माण बर्दास्त नहीं करेंगे और ग्राउण्ड का निर्माण विभिन्न खेल के अनुरूप ही किया जाएगा।
जबकि सच्चाई यह है कि ग्रास कोट के बाहर निगम के द्वारा जो रन-अप पिच तैयार किया गया है वह छोटा है, जैसा की वरिष्ठ व अनुभवी खिलाड़ियों का कहना है कि रनअप पिच को कम से कम 500 मिटर को होना चाहिए, लेकिन यह पिच 500 मिटर का है ही नहीं, वहीं दूसरी ओर नगर के खिलाड़ी महापौर ने छोटी रन अप पिच तो बनवाई ही, इसके बाद इस रन अप पिच पर डामरीकरण करवा दिया है, जिससे की खिलाड़ियों को परेशानी न हो।
जबकि इस विषय में अनुभवी खिलाड़ी व चिकित्सकों का कहना है कि रन-अप पिच कठोर नहीं होना चाहिए, चिकित्सकों व अनुभवी वरिष्ठ खिलाड़ियों के अनुसार इस पर यदि कोई व्यक्ति लगातार दौड़ता है तो उसके घुटने में दर्द की शिकायत जल्द ही होगी अर्थात् रन-अप पिच कांक्रिट या डामरीकृत नहीं होना चाहिए। लेकिन इसके बावजूद इस तरह के पिच का निर्माण क्यों कराया गया है यह तो खिलाड़ी महापौर और उनके साथ इस के निर्माण कार्य में दिशा-निर्देश दे रहे लोग ही जानेंगे।
दूसरी ओर सरगुजा जिले के लिये पहली बार कोई ग्रास मेट युक्त ग्राउण्ड गांधी स्टेडियम को बनाया गया, लेकिन जिस तरह से सरगुजा के लोगों को इस ग्राउण्ड में अनोखे घास को लगाकर मुर्ख बनाया गया है, इसे आम जनता तो नहीं जानती लेकिन जो खिलाड़ी बाहर से राष्ट्रीय स्तर पर या फिर अन्य जगहों पर खेल कर आए हैं वे यहीं कहते हैं कि यहां के खिलाड़ियों को मुर्ख बनाने के लिये यह घास ठिक हैं लेकिन वास्तव में यह दूब घास (लॉकल बोली में) है। जो कि खेल के लिये सही नहीं है, यदि इसमें क्रिकेट का खेल हो तो गेंद की रफ्तार पर ब्रेक लग जाता है अर्थात वह धिरे हो जाता है, जैसा कि महापौर क्रिकेट ट्राफी के दौरान देखा भी जा चुका है कि गेंद अच्छी गति में मारने के बावजूद ग्राउण्ड में रूक जाती थी। इन सब के अलावा भी कई तरह की खामियां इस ग्राउण्ड में है, लेकिन बावजूद लोग इन खामियों को गिनाना नहीं चाहते वे केवल ग्राउण्ड में खेलना चाहते हैं, लेकिन शायद इन्हीं खामियों को छूपाने के लिये ही नगर निगम के द्वारा ग्रास मेट युक्त ग्राउण्ड को हमेशा ताले में बंद करके रखा जाता है।
अभी पिछले दिनों ही छ.ग. सरकार के मंशानुरूप में जिले स्तर पर खेल प्रशिक्षण कैंप का प्रतिवर्ष की तरह इस वर्ष भी सरगुजा जिले के अम्बिकापुर मुख्यालय में खेल एवं युवा कल्याण विभाग के द्वारा 21 दिवसीय प्रशिक्षण कैंप आयोजित की गई है। लेकिन विडम्बना यह है कि राज्य शासन के आदेशानुसार व मंशानुरूप आयोजित खेल प्रशिक्षण के लिये भी गांधी स्टेडियम को निगम के द्वारा प्रशिक्षण आयोजकों को नहीं दिया जा रहा था। अंतिम में काफी मान मनौवल व हाथ-पांव जोड़ने पर निगम ने 11,500.00 रूपये की मांग की गई। जब आयोजकों ने फंड की कमी बताई गई तो निगम ने उन्हें खेल मैदान देने से इंकार कर दिया। इसके बाद जब कुछ खेल संघों के प्रतिनिधियों ने निगम आयुक्त व महापौर के साथ मिलकर चर्चा की तब कहीं जाकर ग्राउण्ड उपलब्ध हो पाया है। वह भी आयोजकों से यह कहा गया है कि 15 मई के बाद आप केवल एक समय अर्थात (एक टाइम सुबह के वक्त ही) प्रशिक्षण आयोजि कर सकते हैं, जबकि दूसरे वक्त ग्राउण्ड में एमएस सिंहदेव फाउण्डेशन के द्वारा क्रिकेट प्रतियोगिता आयोजित करना बताया गया है।
इन सब के बिच निगम के महापौर, आयुक्त, सभापति व जिला प्रशासन के कलेक्टर से मैं यहीं पुछना चाहता हूं की आखिरकार खेल के लिये खिलाड़ी जाएं तो कहां जाए, कौन-सा मैदान उन्हें खेल के लिये दिया गया है यह बता दिया जाए और बिना ग्राउण्ड के यदि जिला प्रशासन व राज्य सरकार उत्कृष्ठ खिलाड़ी चाहेगी तो यह कैसे संभव है।

कुछ ग्राउण्ड जिन्हें उपयोग के लिये कहा गया है -
अम्बिकापुर नगर निगम क्षेत्र में कुछ और ग्राउण्ड हैं जिन्हें उपयोग के लिये निगम के द्वारा कहा गया है, लेकिन उनकी क्या स्थिति है इस पर भी एक नज़र डालना जरूरी है।

कलाकेन्द्र - जब खेल प्रशिक्षण कैंप हेतु खेल एवं युवा कल्याण विभाग के आयोजकों ने निगम ने गांधी स्टेडियम ग्राउण्ड के लिये संपर्क किया तो उन्होंने कलाकेन्द्र मैदान में खेल प्रशिक्षण आयोजित करने की बात कही। जबकी वास्तविकता तो यह है कि कला केन्द्र मैदान में हमेशा कुछ न कुछ कार्यक्रम आयोजित होते रहते हैं, जिसके कारण ग्राउण्ड में जगह-जगह काफी गढ्ढे बने हुए हैं साथ ही यह मैदान ग्रास मेट युक्त नहीं है। वहीं दूसरी ओर ग्राउण्ड मुख्य सड़क से लगा हुआ है, वहीं ग्राउण्ड में हमेशा टोल-मुहल्ले में बंटी छोटी-छोटी बच्चों के द्वारा विभिन्न प्रकार के खेल खेले जाते हैं, जिन्हें हटाना मुमकिन नहीं है।

पी.जी. कॉलेज ग्राउण्ड - पी.जी. कॉलेज ग्राउण्ड के एक छोर पर हॉकी ग्राउण्ड के निर्माण का कार्य जारी है, जबकी दूसरी छोर समतल है ही नहीं, उस ग्राउण्ड में कॉलेज के छात्रों के लिये ही अलग-अलग खेलों के छोटे-छोटे कोट बने हुए हैं साथ ही गांधी स्टेडियम ग्राउण्ड का रन-अप डामरीकृत होने के कारण जो लोग खेल से जुड़े हुए हैं साथ ही जो पुलिसभर्ती एवं अन्य कार्यों के लिये तैयारी करते हैं, हॉस्टल में रहने वाले कॉलेज के छात्रों के लिये भी यहीं ग्राउण्ड उपलब्ध है तथा सुबह-शास वॉक करने वाले भी यहां पर आते हैं ऐसे में इस ग्राउण्ड का उपयोग कैसे किया जा सकता है, यह समझ से परे है।
अंचल ओझा
प्रधान संपादक युवा मत

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